Thursday, February 14, 2013

उसकी खामोश नजर,
कुछ कही ,पर समझ न पाया मै!
क्यों लफ्जो से बात करता,
जब इशारों को समझ न पाया मै!

न जाने क्यों, हर नज़ारे को,
अजीब सा देखती थी !
पत्थर सा था "वह" ,
जिसे सजीव सा देखती थी!

कभी बादलो की छत को,
जी भर के देखती!
कभी पुरुआ हवा से,
बदन को सेकती !

उस नादान को क्या कहता,
वो तो दिल की सुन रही थी!
शायद पिया मिलन की,
एक ख्वाब बुन रही थी!

शाम भी थी ढल चुकी,
रात पड़ाव लगा चुकी थी!
तारो की तैयारी हो रही थी,
चाँदनी दस्तक लगा चुकी थी!

सोच रहा था , सफ़र दूर है,
फिर वक़्त क्यों भाग रहा है!
बहुत कुछ है उसकी नजरो में,
उसे जानने को, एक दिल जाग रहा है!

Saturday, February 9, 2013

आज जेहन में कोई सवाल नहीं,
उदास है ये दिल, दिल में भी कोई ख्याल नहीं!
समय था कुछ करने का, कर न पाया !
अब तक कुछ न कर पाया, इसका मलाल नहीं!

अब आया है वक़्त बदलने का,
रोज थोडा बदल रहा हूँ !
राह-ए-जिन्दगी का बहुत बड़ा है
हर रोज जीवन डगर पर, टहल रहा हूँ !

सब कहते है बदल जाओ,
हम बदल जाये तो क्या, आवाम में भी ये सवाल रखना!
केवल बदले न जुबान यहाँ ,
बदले सबके दिल इसका भी ख्याल रखना !

ये भी एक नशा है ,
हर रोज थोडा बदलने का!
अकेले तो सब चल रहे है ,
अब समय आया है, सबके साथ चलने का!

Sunday, February 3, 2013

!! तेरे शहर के लोग !!

अब न जाने क्यों ढूंढते है "मुझे", तेरे शहर के लोग!
इतना  भी  तो  बुरा नहीं था ,   मेरे   प्रेम के रोग !

हर हाथ में पत्थर था उनके,
जब था तेरी गलियों से गुजरा !
हर पत्थर पर खून था  लगा,
हर मंजर में था सन्नाटा पसरा !

मेरा किस्मत क्यों लाया,    ये  क्यों हुआ  ये संजोग!
अब न जाने क्यों ढूंढते है "मुझे", तेरे शहर के लोग!

कुसूर क्या था? बस दिल लगाने का,
दिल पर कब किसका बस चला है !
हम तो इश्क को जन्नत समझे ,
तेरे शहर वालो को, क्यों लगती ये बला है !

इतना भी  तो  बुरा  नहीं  था ,    मेरे  प्रेम के रोग !
अब न जाने क्यों ढूंढते है "मुझे", तेरे शहर के लोग!

अब तेरे शहर न लौटूंगा, भले क्यों न तडपाये, तेरे बिरह - बियोग!
मै तो हु सीधा-साधा, न जाने क्यों खौफ खाते, तेरे शहर के लोग !


Friday, February 1, 2013

मेरी कविता कुछ ऐसी है.....

ये निकले जो,  "महफ़िल" से, एक नयी उमंग लाती है,
जो गुजरे, "साज" से एक नयी तरंग लाती है !

मेरी कविता कुछ ऐसी है....

इश्क से निकले तो दर्द, समाज से निकलकर ब्यंग लाती है,
जो कभी गुजरे राम - रहीम के दर से, तो फिर सत्संग लाती है !

मेरी कविता कुछ ऐसी है....

बादलो से गुजरे तो , एक  धनुष सतरंग लाती है!
कभी दिल से गुजरे तो प्यार का एक रंग लाती है !!

मेरी कविता कुछ ऐसी है...........

Monday, January 28, 2013

कभी मुझे सायर मत कहना,
 मै तो एक मुसाफिर हूँ ....
गुनगुनाते सफ़र पर निकला हु !

मेरे अल्फाज़ तेरे दर्द के साथी बनेंगे,
जब जी में आये गुनगुना देना .....!!
राह में और भी मिलेंगे "दर्द के मारे"
उन्हें भी  ये सुना देना ....!!!

कभी मुझे हमसफ़र न समझना,
मै तो एक मुसाफिर हूँ ...
गुनगुनाते सफ़र पर निकला हु !

जब जी चाहे ..
कुछ वक्त हो तो साथ बिता लेना,
आँशु जब भी छलकने लगे,
मुझे सीने से लगा लेना ..!!

कभी मुझे बादल न समझाना..
मै तो एक मुसाफिर हु...
गुनगुनाते सफ़र पर निकला हु!


जब धुप लगेगी में दिल में, पनाह दूंगा,
सर्द में,
कभी तुझे न अपनी छाव में लाऊंगा,
प्यास लगे इसारा करना,
 मद्धम मद्धम बरस जाऊंगा .!!


मै तो एक मुसाफिर हु...
गुनगुनाते सफ़र पर निकला हु!

Yaad !!

ना जाने उसकी "पायल" उसे, मेरी याद दिलाती की नहीं,
मै तो उसके  "बाली" को सिने से लगाकर सोता हु...
ना जाने उसे मेरी याद आती की नहीं..
अब भी  मै, उसे याद कर, पल पल रोता हु ...!!

रिश्ते  वो न जुड़ सके, जो दुनिया के बनाये है,
हर पल " ये " बोझ मन में ढोता हूँ ...!
कैसे समझता मै उसको, उससे बिछड़कर,
ना जगता हूँ , ना सोता हूँ ..!!

चाहा था तुम्हे, अब भी तुझे चाहता हूँ,
जब दूर जाना हो मुझसे, एक बार बस बता के जाना !
क्या पता..कभी दस्तक दे दे तेरे सहर में,
मुलाकात की हसरत है, अपना पता दे के जाना !!

ना मिलना होगा मुझसे तुम्हे ... वो भी मंजूर है,
लफ्जो को बिराम देकर , बस इशारो से जता  देना !
हम कभी न लौटेंगे, तेरे दुनिया में ,
........पर मेरी ख़ता बता देना !!

Sunday, November 25, 2012

उसे याद तो मेरी आती है.. फिर,
पर ना जाने क्यों, सब से छुपाती है..!

मेरा दिल भी रोता है हर रात, उसे खोने के बाद,
अब तो हर  रात जागता रहता हू, दुनिया के सोने के बाद..!

सपने की दुनिया थी, तेरे पल भर के प्यार का एहसास,
ना जाने क्यों लम्हे लगते थे ही कुछ खास..!

दिल सोचता है हर पल ये ....

उसे मिलना ना था तो, पास बुलाया क्यों था,
ना थी दिल में जगह तो, होठो पर वो लफ़्ज लाया क्यों था ..!

बदनाम है " संदीप ", ये कहते है इस सहर के लोग,
वो क्या जाने, होते क्या है  ये प्यार के रोग ...!
हालत अब ऐसी है ........

उसकी यादो और जख्मो को, छुपाकर रखता हू इस दिल के पास,
" नमक " लेकर बैठे है, हर मोड़ पर , कुछ अपने ही खास .!