Sunday, October 6, 2019

मैं कौन हूँ ?


कभी भीड़ से निकल कर कहने दो मुझे कौन हूँ...
हां... सब कह रहे है, मैं सुन रहा हूँ, इसलिए मौन हूँ

ये जो मापते हो, आंकते हो मुझे,
तुम अपने तरक्की के  पैमाने से,
मै कब टूटा हूँ?
किसमत के आजमाने से |

रात  के  भागते  ख्वाबो  में,
खुद  को  नींद  से  जगाता  हूँ |
इस भागमभाग  में   सुबह  हो  जाती  है,
अब ख्वाब  या  नींद  कहाँ  पूरा  कर पता हूँ

एक  जिद्द  करता  हूँ,  इस  शहर  में बस जाने  की,
फिर ...न  जाने  क्यों  मन  करता है, इससे दूर भाग  जाने की |

असमंजस है, किसकी कहानी लिखू , किस की मै बातें सुनु,
सब के किस्से अपने, किसके जैसा ख्वाब बुनु |

ये  जो  काले  घेरे, आँखों  को  घेरे  है,
यही तो में मेरे ख्वाबो के दीप के अँधेरे है।
हर दिन मोटे होते  चश्मे के शीशे,
अब उम्र कम और ख्वाब बहुतेरे है।

ख्वाब और जिम्मेदारी कुछ ऐसी है
सोता है शहर तो जागता हूँ |
कुछ.. कश्मकश ऐसी है.. नए ख्वाब बुनता हूँ ...
फिर नए शहर भागता हूँ।

अब हर नये ओहदे और तनख्वाह,
गुलाबी  गुलाल  से   लगते  है। 
जिम्मेदारियों के बोझ तले,
कुछ दिन बाद... होली के बदरंग गाल से लगते है | 

Sunday, October 18, 2015

सियासत

खुदा से विरोध कर, कुछ सवाल यूँ ही पूछ लिया।
ये सियासत थी, तवायफ सी, फिर इसे क्यों बना दिया।

शहर में दो बदनाम ठिकाने, कहाँ का इन्साफ है?
एक छुपकर हो तो पाप, दूसरे सरेआम सात खून माफ़ है ?

कोठे खुल जाए जिस शहर  में,  बदनाम सा लगता है।
चुनाव में, ये जो नुक्कड़ पर होता, क्यों सही काम सा लगता है।


अकेला हूँ, फिर भी  "खुदा" तेरा विरोध कर, शहर चला जाऊँगा ।
 गर कहनी होगी कुछ बाते "सरकार" से, भीड़ कहाँ से लाऊंगा।

लाख मरता होऊंगा, अपने मजहब अपने देश पर।
पर  उस मरने का सुबूत कहाँ से लाऊंगा।  

Monday, April 6, 2015

मुश्किल है अपना मेल प्रिये - New version

प्रसिद्ध कवि सुनील जोगी जी  की एक रचना है, उसमें कुछ अपनी लाइने जोड़ रहा हूँ। ये उन्ही की  है, कविता को आगे बढ़ने की कोशिस है।


तुम जानी मानी रचना  सी , मैं  ट्विटर  का  ट्रोल  प्रिये।
तुम सधी बाँसुरी सुरीली, मैं फटा हुआ  सा  ढोल प्रिये।
तुम चतुर चंचल सुन्दर सी, मैं बुड़बक बकलोल प्रिये।
तुम बटर चिकेन सी ललचाती, मैं तरकारी का झोल प्रिये।   
तुम शास्त्री जी सी कामकाजी, मै मोदी सा बड़बोल प्रिये। 

तुम देशी घी की गगरी हो, मैं ढक्कन का तेल प्रिये।
मुस्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं  है खेल प्रिये  .

तुम खिली हुई बहारो सी , में जंगल घनघोर प्रिये ,
तुम हसी खिलखिलाती चेहरे सी, मैं भिखमंगे का लोर प्रिये।
तुम म्यूजिक चैनल की गीतों सी, मैं न्यूज चैनल्स का शोर प्रिये।
तुम रहमान की ओरिजिनल कॉपी सी मै प्रीतम सा चोर प्रिये।

तुम बुलेट ट्रेन की रफ़्तार, मैं  लोकल पैसेंजर रेल प्रिये।
मुस्किल है अपना मेल प्रिये , ये प्यार नहीं है खेल प्रिये।

 तुम उन्मुक्त सी छन्दो वाली, मै धारा 66A का एक्जाम्पल हूँ।
तुम बीबीसी की एंकर जैसी, मैं जी न्यूज़ का सैंपल हूँ।
 तुम सदा बहार सरकारों वालो, मैं धरने का टेम्पल हूँ।


तुम भरी दोपहरी में ठंढी हवा, मैं धूल उडाता आंधी हूँ।
तुम प्रसिद्द इंदिरा सी जैसी, मैं पोगो देखता राहुल गांधी हूँ।
तुम हीरे की  चमचम की, मैं नकली  सा चाँदी  हूँ।
तुम स्विस देश की जन्नत सी, मैं चाइना की आबादी हूँ।

तुम शोरूम की शोभा हो, मैं फुटपाथ का सेल प्रिये।
मुस्किल है अपना मेल प्रिये , ये प्यार नहीं है खेल प्रिये।

 

Saturday, March 28, 2015

सुबह सुबह

खुली आँख जो सुबह सुबह।
खामोशी थी, सिलवटे थी, पर तेरा नजारा न था।

यादें थी , कुछ बातें भी थी,
पर जगाने का वो खूबसूरत, तेरा इशारा न था।

हर सुबह जंग सी छिड़ती है इस दुनिया में।
तू रहती थी तो, कभी हारा न था।

महफ़िल में होकर भी तनहा सा हूँ,
शायद ! तुझसे मिलकर, दूर रहना गवारा न था।


Thursday, February 6, 2014

अथ: श्री भैंस कथा !!

सुबह सुबह सूबे में नयी सी हलचल रही,
भैसे तबेला छोड़कर, शहर में थीं टहल रही।

सेना, कमांडो क्या जवान,
सबकी हुई नींद हराम।
सुबह दोपहरी शाम तक,
गुस्से में थे आज़म खान!!

वो लालू से मिलने गयी,
ऐसा ही मै, सुना कुछ किस्सा,
कुछ समझौता था, लेने गए थी,
अपने "चारे" का हिस्सा !!

कुछ लोग "भूसे" को याद कर,
इशारा, दिमाग पर, राहुल के किया था,
कुछ लोगो ने मायावती के,
बहनो का जिक्र किया था।

कुछ कहे ये "बीन" सुनने,
मेरठ रैली में खड़ी मिली,
कुछ कहे ये अखिलेश जी के,
नाक के निचे पड़ी मिली।

अगले दिन जब भैस मिली,
"सैनिक" घोड़े बेच फिर सोते मिले ,
भैसो की किस्मत की तारीफ कर,
आज़म जी, अपनी किस्मत पर रोते मिले।

Thursday, January 23, 2014

"शहर का हाल"

अख़बार कुछ लिखते है, अपने अपने नाम से ,
चल आज किस्सा एक सुनते है, इस नादान से।  

नेता खेल रहे हैं, अपनी पारी, धर्म और ईमान से,
ढोंगी बड़ा रहा है खुद को, अल्लाह और भगवान से। 

कमजोर दे रहे थे गालिया, क्यों लड़ बैठे पहवान से।
सब अपने झुण्ड में मस्त थे, ग़ुम थे सब अपनी पहचान से।

खुद से परेशान देखा था सब को, सब खफा थे भगवान से।
क्यों इतने "खुदा" बनाये, चल पूछते है इंसान से।

Saturday, October 26, 2013

आम आदमी

आज कुछ सुनता  हूँ ,
कुछ  लिखता हूँ ,
कुछ कहने का अधिकार मिला ,
उन अधिकारों से चीखता हूँ।

सुनता है  कौन मेरी ,
जरुरत बस देखते है लोग।
सब चल रहा है, चलते रहने दो,
आँखे खुली है, पर है न जागने का रोग।

जेब पर डांका जब  पड़े,
खिज़ कर, खरी खोटी से काम चलाते है,
नून प्याज़ महंगा सब ,
बस रोटी से काम चलते है।

बड़े बड़ो और धनियों की ,
सब सुने हज़ार बार है।
पाँच में बदलो या ना बदलो ,
यही बस मितला है, आम आदमी की सरकार है।

पाँच साल का पर्व जब आया ,
मेला लगा था , वादे मिल रहे थे वोट से,
कभी गुमसुम कभी जयजयकार लगा,
मजमा देख सोचता, सरकार चल रही नोट से।

सोचता हूँ , यही नियम है, चलता है,
थोडा समय दे मै  भी वहा से चलता रहा।
"आम  आदमी " था और हूँ,
पर नेताओ के भाषण  में देश बदलता रहा।